धन्ना जाट की अनन्य भक्ति

​राजस्थान के एक गाँव में धन्ना नाम के एक सीधे-सादे किसान रहते थे। उनके मन में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास था।

​भक्ति की शुरुआत

​एक बार धन्ना ने एक ब्राह्मण को ठाकुर जी (मूर्ति) की पूजा करते देखा। उन्होंने ब्राह्मण से पूछा, "महाराज, आप यह क्या कर रहे हैं?" ब्राह्मण ने उत्तर दिया, "मैं भगवान को भोग लगा रहा हूँ, इससे वे प्रसन्न होते हैं और मनोकामना पूरी करते हैं।" धन्ना के मन में भी ठाकुर जी की सेवा करने की इच्छा जागी। उन्होंने ब्राह्मण से एक मूर्ति माँगी।

​ब्राह्मण ने धन्ना की सरलता देखी और उन्हें एक साधारण पत्थर का टुकड़ा देकर कहा, "यही तुम्हारे ठाकुर जी हैं, इन्हें खिलाए बिना तुम कुछ मत खाना।"

​धन्ना का हठ

​धन्ना घर आए, पत्थर को नहलाया और उसके सामने बाजरे की रोटी और लस्सी रख दी। वे हाथ जोड़कर बैठ गए और बोले, "हे ठाकुर जी! भोग लगाओ।"

​काफी समय बीत गया, लेकिन पत्थर ने खाना नहीं खाया। धन्ना को लगा कि शायद उनसे कोई गलती हो रही है या ठाकुर जी उनसे नाराज हैं। उन्होंने संकल्प लिया, "जब तक मेरे ठाकुर जी नहीं खाएंगे, मैं भी अन्न का एक दाना ग्रहण नहीं करूँगा।"

​भगवान का प्रकट होना

​एक दिन बीता, दो दिन बीते, और देखते-देखते तीन दिन बीत गए। धन्ना भूख से निढाल हो रहे थे, लेकिन उनकी श्रद्धा टस से मस नहीं हुई। उनकी निष्काम और निश्छल भक्ति देख भगवान स्वयं विवश हो गए।

​चौथे दिन, उस पत्थर से साक्षात नारायण प्रकट हुए। उन्होंने धन्ना के हाथों से बड़े चाव से रोटी खाई और लस्सी पी। धन्ना की खुशी का ठिकाना न रहा। अब तो यह रोज का नियम बन गया—धन्ना पुकारते और भगवान आकर भोजन करते।

​सीख

​यह कथा हमें सिखाती है कि: